Monday, September 11, 2017

Ward or Mobile Radiography

        वार्ड या मोबाइल रेडियोग्राफी उन पेशेंट के लिए की जाती हैं जो या तो किसी ट्रौमा या अन्य किसी कारन से रेडियोलोजी विभाग में नहीं आ सकते या किसी संक्रामक रोग के कारण उन्हें विभाग में लाना संभव न हो | ऐसे पेशेंट अलग- अलग विभाग के हो सकते हैं जिन्हें X-ray विभाग में लाया जाना संभव नहीं होता हैं जैसे- Surgical ward, Medical ward, Recovery room, Emergency, Coronary Care Unit (CCU), Cardiac Surgery Unit (CSU), Special Baby Care Unit (SBCU), Isolation or Barrior Nursed ward आदि विभाग के पेशेंट |ऐसे पेशेंट्स की रेडियोग्राफी उनके बिस्तर पर ही की जाती है चाहे वों वार्ड में हो या ICU में | इसके लिए एक special radiographic equipment होता हैं जिसे Mobile X-ray Machine कहते हैं | इस मशीन को एक संसथान में यहाँ से वहा तक ले जाना आसान होता हैं |
Ward या mobile radiography करते समय एक रेडियोग्राफर को काफी बातो का ध्यान रखना पड़ता हैं तथा उसे कई ऐसे परिस्थितियों का सामना करना पड़ता हैं जो इस काम को जटिल बनाता हैं जैसे-1.       Patient की Medical condition इतनी अच्छी नहीं होती हैं की पेशेंट के द्वारा अच्छा Co-operation मिल सके |2.       पेशेंट की Conciousness |3.       पेशेंट on life support system.4.       Drips, Chest and Abdominal drains.
अतः रेडियोग्राफर को Ward या mobile radiography इस तरह से पूर्ण करनी चाहिए की-1.       पेशेंट का Medical Treatment तथा उसकी Nursing care प्रभावित ना हो |2.       Patient की progress या Recovery कम से कम प्रभावित हो |3.       वार्ड में कम से कम व्यवधान उत्पन्न हो |

         वार्ड या मोबाइल रेडियोग्राफी के समय Xray Equipment का चुनाव Radiographic Procedure की आवश्यकता के अनुसार किया जाना चाहिए |सबसे पहले Patient के Xray examination का request form check कर लेना चाहिए ताकि ये निश्चित किया जा सके की xray ward जरुरी हैं तथा correct equipment and detector का चुनाव किया जा सके |Patient identification protocol का पूर्ण रूप से पालन किया करना चाहिए ताकि Correct patient identify किया जा सके |एक वार्ड में एक से ज्यादा patient हैं जिनका radiographic examination किया जाना हैं तो examination में उपयोग में लिए जाने वाले image dector की proper marking कर लेनी चाहिए ताकि एक ही detector पर double exposure से बचा जा सके |Examination start करने से पहले पेशेंट की medical history चेक कर लेनी चाहियें | Patient के traction, ECG leads तथा drains में कोई disturbance medical staff की अनुमति व देखरेख में ही करनी चाहिए |किसी गंभीर बीमार रोगी को उठाने व image receptor की positioning का कार्य नर्सिंग स्टाफ के सहयोग व निरिक्षण में ही करना चाहिए |Infection control के लिए हर Exam से पहले तथा बाद में Xray Unit तथा Image Receptor को Clean कर लेना चाहिए तथा सुखा लेना चाहिए |


Friday, December 9, 2016

एनोड असेम्बली

एक्सरे ट्यूब में एनोड पॉजिटिव इलेक्ट्रोड होता हैं |एनोड के आधार पर एक्सरे ट्यूब दो प्रकार की होती हैं  स्टेशनरी एनोड एक्सरे ट्यूब  (Stationary anode xray tube) तथा रोटेटिंग एनोड एक्सरे ट्यूब (Rotating anode xray tyub ) एनोड |
(1). स्टेशनरी एनोड -  स्टेशनरी एनोड एक्सरे ट्यूब के एनोड में एक 2-3mm मोटी टंगस्टन प्लेट होती हैं जो कॉपर के मोटे ब्लाक में धसी रहती हैं | सामान्यतया कॉपर की प्लेट वर्गाकार होती हैं तथा इसकी विमाये (लम्बाई तथा चोडाई )लगभग 1cm होती हैं | एनोड एंगल 15-20 डिग्री होता हैं | एनोड मटेरियल टंगस्टन के लेने के निम्न कारण होते हैं-

  1. टंगस्टन का उच्च परमाणु भार (74) होता हैं जो इसे एक्सरे प्रोडक्शन के लिए उपयुक्त बनाता हैं |
  2. इसका गलनांक बिंदु अधिक (3370 ०C ) होता जो इसे एक्सरे प्रोडक्शन के दोरान उत्पन्न अत्यधिक ताप को सहने योग्य बनाता हैं |
  3. यह ऊष्मा का अच्छा अवशोषक होता हैं तथा ऊष्मा को तेजी से टारगेट से दूर फेलाता हैं |
टंगस्टन की तापीय विषेशताए होते हुए भी यह अधिक एक्सपोज़र सहन नहीं कर सकता हैं | इसलिए टंगस्टन के छोटे टुकड़े को बड़े कॉपर ब्लाक में लगाया जाता हैं | कॉपर, टंगस्टन  के मुकाबले ऊष्मा का अच्छा चालक होता हैं इसलिए टंगस्टन ब्लाक को कॉपर में लगाये जाता हैं जिससे एनोड की तापीय विषेशताए बढ़ जाती हैं जिससे यह जल्दी ठंडा होता हैं |
         टंगस्टन टारगेट का वास्तविक आकार फोकल स्पॉट के मुकाबले बहुत बड़ा लिया जाता हैं क्योकि कॉपर का गलनांक बिंदु (1070 ०C ) होता हैं जो टंगस्टन के गलनांक से बहुत कम होता हैं | एक सिंगल एक्सपोज़र से ही फोकल स्पॉट का ताप 1000 ०C या इससे ज्यादा  पहुच जाता हैं  जो तुरंत ही फोकल स्पॉट के आस पास की धातु को गर्म कर देता हैं | अगर टंगस्टन ब्लाक छोटा होगा तो यह अपने आस पास की धातु (कॉपर ) को पिघला देगा इसलिए टंगस्टन ब्लाक का आकर फोकल स्पॉट से बड़ा लिया जाता हैं ताकि यह अपने आस पास उष्मा पहुचने से पहले कुछ ठंडा हो सके | प्रत्येक धातु गर्म होकर पिघलती हैं अलग अलग धातुओं का तापीय  प्रसार गुणांक अलग अलग होता हैं , जिससे सभी धातु अलग अलग दर से पिघलती हैं इस कारण कॉपर व टंगस्टन का जोड़ ढीला होने से टंगस्टन कॉपर ब्लाक से अलग होकर निचे गिर सकता हैं |
(2).


Tuesday, December 6, 2016

लाइन फोकस प्रिन्सिपल (Line Focus Principle)

एक्सरे ट्यूब में टंगस्टन एनोड पर उपस्थित वो क्षेत्र जहा कैथोड से उत्सर्जित इलेक्ट्रान स्ट्रीम (धारा ) आपतित होती हैं फोकल स्पॉट कहलाता हैं | इन आपतित इलेक्ट्रान का 99% हिस्सा ऊष्मा में परिवर्तित हो जाता हैं केवल 1% से भी कम हिस्सा ही आवश्यक एक्सरे में बदलता हैं | यह उत्सर्जित उर्जा फोकल स्पॉट एरिया में एक सामान रूप से फेल जाती हैं | अतः फोकल स्पॉट एरिया जितना बड़ा होगा, इलेक्ट्रान एनोड की टक्कर से उत्पन्न ऊष्मा अधिक स्थान पर फैलेगी टारगेट (एनोड) कम गर्म होगा अतः उसके पिघलने की संभावना कम होगी, फोकल स्पॉट छोटा लेने पर एक छोटे से स्थान पर अधिक उर्जा फोकल स्पॉट के गर्म होकर पिघलने का कारण बनती हैं | अतः एनोड की ऊष्मा धारण क्षमता (Heat Loading capicity) बढ़ाने के लिए ये आवश्यक हैं की फोकल स्पॉट को बड़े से बड़ा लिया जाये |
 लेकिन फोकल स्पॉट का आकार अधिक ले तो रेडियोग्राफिक डिटेल पर प्रभाव पड़ता हैं | फोकल स्पॉट जितना छोटा होता हैं, एक्सरे फिल्म पर रेडियोग्राफ़िक डिटेल अच्छी प्राप्त होती हैं | अतः एक्सरे ट्यूब की आयु बढ़ाने के लिए आवश्यक हैं की फोकल स्पॉट बड़ा लिया जाते तथा अच्छी रेडियोग्राफिक डिटेल के एक्सरे प्राप्त हो इसके लिए आवश्यक हैं की फोकल स्पॉट छोटे से छोटा लिया जाये |
 सन 1918 में लाइन फोकस प्रिन्सिपल (Line Focus Principle) प्रस्तुत किया गया जिससे इन सभी समस्याओं का समाधान पा लिया गया |
 फोकल स्पॉट की आकर व आकृति एनोड से उत्सर्जित इलेक्ट्रान बीम की आकार व आकृति पर निर्भर करती हैं तथा इलेक्ट्रान बीम की आकार व आकृति टंगस्टन फिलामेंट की विमा पर, फोकसिंग कप के निर्माण पर तथा फिलामेंट के फोकसिंग कप में स्थिति पर निर्भर करती हैं | टारगेट सतह जिस पर इलेक्ट्रान बीम आकर टकराती हैं को इलेक्ट्रान बीम के लम्बवत तल से थोडा सा झुका देते हैं, एनोड के इलेक्ट्रान बीम के लम्बवत तल से इस झुकाव को एनोड एंगल कहते हैं | एनोड एंगल अलग-अलग डिजाईन की एक्सरे ट्यूब के लिए अलग-अलग होता हैं तथा डायग्नोस्टिक रेडियोलोजी एक्सरे ट्यूब में सामान्यतया यह लगभग 60 से 200 होता हैं | इस झुकी सतह के कारण इस पर आपतित इलेक्ट्रान बीम के टक्कर का क्षेत्रफल बढ जाता हैं यह इस सतह का वास्तविक फोकल स्पॉट (Actual Focal Spot) कहलाता हैं | एक्सरे बीम के निकलने की दिशा से देखने से फोकल स्पॉट छोटा दिखाई देता हैं यह आभासी( Apparent or Effective) फोकल स्पॉट कहलाता हैं |
                a*SinѲ = b    (यहाँ a वास्तविक फोकल स्पॉट तथा b आभासी फोकल स्पॉट हैं
Sin16.50=0.284 तथा Sin200=0.342 )

अतः 16.50 एनोड एंगल 200 एनोड एंगल से छोटा फोकल स्पॉट उत्पन्न करेगा, एनोड एंगल जितना कम होगा फोकल स्पॉट उतना ही छोटा होगा | प्रायोगिक रूप से फोकल स्पॉट को एक सीमा से अधिक छोटा नहीं किया जा सकता हैं, कम एनोड एंगल पर हील इफ़ेक्ट के कारण एक्सरे इमेज क्वालिटी प्रभावित होती हैं | डायग्नोस्टिक रेडियोलोजी में प्राय एनोड एंगल 150 से कम नहीं लिया जाता हैं | फोकल स्पॉट को सामान्यतया आभासी फोकल स्पॉट के रूप में प्रदर्शित किया जाता हैं | 0.3, 0.6, 1.0. 1.2mm सामान्यतया उपयोग में लिए जाने वाले फोकल स्पॉट हैं |