Tuesday, December 6, 2016

लाइन फोकस प्रिन्सिपल (Line Focus Principle)

एक्सरे ट्यूब में टंगस्टन एनोड पर उपस्थित वो क्षेत्र जहा कैथोड से उत्सर्जित इलेक्ट्रान स्ट्रीम (धारा ) आपतित होती हैं फोकल स्पॉट कहलाता हैं | इन आपतित इलेक्ट्रान का 99% हिस्सा ऊष्मा में परिवर्तित हो जाता हैं केवल 1% से भी कम हिस्सा ही आवश्यक एक्सरे में बदलता हैं | यह उत्सर्जित उर्जा फोकल स्पॉट एरिया में एक सामान रूप से फेल जाती हैं | अतः फोकल स्पॉट एरिया जितना बड़ा होगा, इलेक्ट्रान एनोड की टक्कर से उत्पन्न ऊष्मा अधिक स्थान पर फैलेगी टारगेट (एनोड) कम गर्म होगा अतः उसके पिघलने की संभावना कम होगी, फोकल स्पॉट छोटा लेने पर एक छोटे से स्थान पर अधिक उर्जा फोकल स्पॉट के गर्म होकर पिघलने का कारण बनती हैं | अतः एनोड की ऊष्मा धारण क्षमता (Heat Loading capicity) बढ़ाने के लिए ये आवश्यक हैं की फोकल स्पॉट को बड़े से बड़ा लिया जाये |
 लेकिन फोकल स्पॉट का आकार अधिक ले तो रेडियोग्राफिक डिटेल पर प्रभाव पड़ता हैं | फोकल स्पॉट जितना छोटा होता हैं, एक्सरे फिल्म पर रेडियोग्राफ़िक डिटेल अच्छी प्राप्त होती हैं | अतः एक्सरे ट्यूब की आयु बढ़ाने के लिए आवश्यक हैं की फोकल स्पॉट बड़ा लिया जाते तथा अच्छी रेडियोग्राफिक डिटेल के एक्सरे प्राप्त हो इसके लिए आवश्यक हैं की फोकल स्पॉट छोटे से छोटा लिया जाये |
 सन 1918 में लाइन फोकस प्रिन्सिपल (Line Focus Principle) प्रस्तुत किया गया जिससे इन सभी समस्याओं का समाधान पा लिया गया |
 फोकल स्पॉट की आकर व आकृति एनोड से उत्सर्जित इलेक्ट्रान बीम की आकार व आकृति पर निर्भर करती हैं तथा इलेक्ट्रान बीम की आकार व आकृति टंगस्टन फिलामेंट की विमा पर, फोकसिंग कप के निर्माण पर तथा फिलामेंट के फोकसिंग कप में स्थिति पर निर्भर करती हैं | टारगेट सतह जिस पर इलेक्ट्रान बीम आकर टकराती हैं को इलेक्ट्रान बीम के लम्बवत तल से थोडा सा झुका देते हैं, एनोड के इलेक्ट्रान बीम के लम्बवत तल से इस झुकाव को एनोड एंगल कहते हैं | एनोड एंगल अलग-अलग डिजाईन की एक्सरे ट्यूब के लिए अलग-अलग होता हैं तथा डायग्नोस्टिक रेडियोलोजी एक्सरे ट्यूब में सामान्यतया यह लगभग 60 से 200 होता हैं | इस झुकी सतह के कारण इस पर आपतित इलेक्ट्रान बीम के टक्कर का क्षेत्रफल बढ जाता हैं यह इस सतह का वास्तविक फोकल स्पॉट (Actual Focal Spot) कहलाता हैं | एक्सरे बीम के निकलने की दिशा से देखने से फोकल स्पॉट छोटा दिखाई देता हैं यह आभासी( Apparent or Effective) फोकल स्पॉट कहलाता हैं |
                a*SinѲ = b    (यहाँ a वास्तविक फोकल स्पॉट तथा b आभासी फोकल स्पॉट हैं
Sin16.50=0.284 तथा Sin200=0.342 )

अतः 16.50 एनोड एंगल 200 एनोड एंगल से छोटा फोकल स्पॉट उत्पन्न करेगा, एनोड एंगल जितना कम होगा फोकल स्पॉट उतना ही छोटा होगा | प्रायोगिक रूप से फोकल स्पॉट को एक सीमा से अधिक छोटा नहीं किया जा सकता हैं, कम एनोड एंगल पर हील इफ़ेक्ट के कारण एक्सरे इमेज क्वालिटी प्रभावित होती हैं | डायग्नोस्टिक रेडियोलोजी में प्राय एनोड एंगल 150 से कम नहीं लिया जाता हैं | फोकल स्पॉट को सामान्यतया आभासी फोकल स्पॉट के रूप में प्रदर्शित किया जाता हैं | 0.3, 0.6, 1.0. 1.2mm सामान्यतया उपयोग में लिए जाने वाले फोकल स्पॉट हैं |

Sunday, December 4, 2016

एक्सरे ट्यूब के प्रकार (Types Of Xray Tube)

Coolidge ने तापीय उत्त्सर्जन ( Thermionic Emission ) सिद्धांत पर आधारित एक एक्सरे ट्यूब प्रस्तुत की जिसे Coolidge Tube कहा गया | आधुनिक स्थिर एनोड ( Stationary Anode ) एक्सरे ट्यूब की डिजाईन Coolidge Tube पर आधारित हैं |
एक्सरे ट्यूब का बाहरी कांच का आवरण Pyrex Glass का बना होता हैं | इस निर्वातित (Evacuated ) एक्सरे ट्यूब में एनोड तथा कैथोड दो इलेक्ट्रोड होते हैं |
एक्स रे ट्यूब का वर्गीकरण ट्यूब में स्थित एनोड के आधार पर किया जाता हैं एनोड के विन्यास के आधार पर डायग्नोस्टिक एक्सरे ट्यूब दो प्रकार की होती हैं-
(1)    Stationary Anode Xray Tube- इस प्रकार की एक्सरे ट्यूब में एनोड जो की ऋणात्मक विभव पर होता हैं एक स्थिर तांबे (Copper ) का ब्लॉक होता हैं जिस पर टंगस्टन की प्लेट लगी होती हैं जो टारगेट का कम करती हैं | इस पर कैथोड से उत्सर्जित उच्च गति के इलेक्ट्रान आकर टकराते हैं जिससे एक्सरे किरणे पैदा होती हैं |

(2) Rotating Anode Xray Tube- इस प्रकार की एक्सरे ट्यूब में एनोड टंगस्टन मिश्र धातु की वर्ताकार पट्टी का बना होता हैं जिसको एक्सरे प्रोडक्शन के समय उत्पन्न ऊष्मा से पिघलने से बचाने के लिए एक इंडक्शन मोटर (Induction Motor ) की सहायता से 3000 चक्कर प्रति मिनट की दर से घुमाया जाता हैं, जिससे इलेक्ट्रान की बोछार को हर समय टक्कर के लिए अलग स्थान मिलता हैं तथा उत्पन्न ऊष्मा एक छोटे से स्थान पर फलने के बजाये बहुत बड़े स्थान पर फेल जाती हैं जिससे एनोड के अत्यधिक ऊष्मा के कारण डैमेज होने की सम्भावना कम हो जाती हैं |

Saturday, December 3, 2016

फिलामेंट का वाष्पीकरण (Vaporization Of Filament)



फिलामेंट का वाष्पीकरण (Vaporization Of Filament):- फिलामेंट टंगस्टन की मिश्रधातु का बना होता हैं |इसका गलनांक बिंदु (Melting Point) 3427 ०C होता हैं |इससे इलेक्ट्रान उत्सर्जन के लिए इसे 2200 ०C तक गर्म किया जाता हैं| टंगस्टन खुद एक अच्छा इलेक्ट्रान उत्सर्जक पदार्थ नहीं होता हैं, इसके बजाय टंगस्टन मिश्रधातु कम में लेते हैं क्योकि इसे एक पतले मजबूत तार के रूप में खिंचा जा सकता हैं तथा इसका गलनांक उच्च होने के कारण इसके वाष्पित होने की संभावना कम होती हैं | इस प्रकार की मिश्रधातु के बने फिलामेंट की उम्र (Life Ecpectency ) अधिक होती हैं|
फिर भी फिलामेंट का वाष्पन एक्सरे ट्यूब की उम्र कम होने का मुख्य कारण होता हैं क्योंकि वाष्पीकरण
से फिलामेंट पतला होता जाता हैं, तथा पतला फिलामेंट के टूटने की संभावना अधिक होती हैं | अतः फिलामेंट को वाष्पन से बचाने के लिए अधिक समय तक गर्म नहीं करना चाहिए | इसके लिए एक आधुनिक एक्सरे ट्यूब में एक आटोमेटिक फिलामेंट बूस्टिंग सर्किट (Automatic Filament Boostiong Circuit ) लगा होता हैं | जब यह सर्किट ऑन (ON) होता हैं तथा कोई एक्सपोज़र नहीं हो रहा होता हैं तब एक स्टैंडबाई लो करंट (Stand By Low Current ) फिलामेंट को गर्म करता हैं | यह लगभग 5 ma करंट होता हैं जो फ्लुरोस्कोपी के सामान्य एक्सपोज़र के लिए आवश्यक करंट होता हैं | जब इससे अधिक एक्सपोज़र की आवश्यकता होती हैं तब Automatic Filament Boostiong Circuit एक्सपोज़र से पहले फिलामेंट करंट को सामान्य से बड़ा देता हैं तथा एक्सपोज़र के पूर्ण होने पर फिलामेंट करंट को स्टैंडबाई करंट पर ले आता हैं |
एक्सरे ट्यूब के एनोड व कैथोड से वाष्पित टंगस्टन धातु एक्सरे ट्यूब के कांच की भीतरी सतह पर एक पतली परत के रूप में जम जाता हैं | टंगस्टन की यह परत एक्सरे ट्यूब को भूरा (Bronze Sunburn Colored) रंग प्रदान करता है | यह परत एक्सरे ट्यूब पर दो प्रभाव उत्पन्न करती हैं –
(1). यह एक्सरे ट्यूब से उत्सर्जित एक्सरे में से कम उर्जा के एक्सरे को रोक कर एक फ़िल्टर की तरह कार्य करती हैं जिससे निर्गत एक्सरे की गुणवता (Quality ) प्रभावित होती हैं |
(2). यह परत इलेक्ट्रोड व एक्सरे ट्यूब आवरण के मध्य उच्च विभवान्तर होने से इलेक्ट्रिक आर्क (Electric Arc ) का कारण बनती हैं जिससे एक्सरे ट्यूब के पंक्चर होने की संभावना अधिक होती हैं | इसी कारण ग्लास ट्यूब की जगह धातु के आवरण ( Metal Wall ) वाली एक्सरे ट्यूब डिजाईन की गई |

Friday, December 2, 2016

तापायनिक उत्सर्जन (Thermionic Emission )

Thermionic Emission:-  जब किसी धातु को गर्म किया जाता हैं तब इसके अणु (Atom) तापीय उर्जा ग्रहण कर लेते हैं |इसके कुछ इलेक्ट्रान इतनी उर्जा ग्रहण कर लेते हैं की वो धातु की सतह से कुछ दूर जा सके |जिन्हें थर्मियोन (Thermions) कहते हैं | बिना इस उर्जा के इलेक्ट्रान केवल धातु के अन्दर ही गति कर सकते हैं बाहर नहीं आ सकते हैं |
अत: इलेक्ट्रान का तापीय उर्जा पाकर इस तरह धातु की सतह आना तापीय उत्सर्जन(Thermionic Emission ) कहलाता हैं | इस तरह एक इलेक्ट्रान के गुच्छे का धातु की सतह पर इलेक्ट्रान के बादल (Electron Cloud ) के रूप में इक्कठा होना एडिसन प्रभाव (Eddision Effect) कहलाता हैं |
ये ऋण आवेशित इलेक्ट्रॉन्स के धातु के बहार इक्कठे होकर स्पेस चार्ज (Space Charge) बनाते हैं |यह स्पेस चार्ज अब दुसरे इलेक्ट्रॉन्स को धातु की सतह से तब तक बहार नहीं आने देता हैं जब तक उन्हें इतनी पर्याप्त तापीय उर्जा नहीं दी जाये की वो इस स्पेस चार्ज के प्रतिरोध को पर कर सके |
इस स्पेस चार्ज के द्वारा धातु की सतह से दुसरे इलेक्ट्रान को बहार आने से रोकने को स्पेस चार्ज इफ़ेक्ट (Space Charge Effect) कहते हैं |
जब इलेक्ट्रान फिलामेंट से निकलते हैं तो फिलामेंट खुच धन आवेश ग्रहण कर लेते हैं जिससे फिलामेंट इस स्पेस चार्ज से कुछ इलेक्ट्रान दुबारा आकर्षित कर लेता हैं | इस तरह जब फिलामेंट को इस उत्सर्जी ताप (Emission Temprature ) तक गर्म करते हैं तो एक साम्यवस्था बन जाती हैं जिसमे फिलामेंट से उत्सर्जित होने वाले इलेक्ट्रान की संख्या फिलामेंट के द्वारा अवशोषित होने वाली इलेक्ट्रान की संख्या के सामान होती हैं |जिससे स्पेस चार्ज में इलेक्ट्रान की संख्या नियत रहती हैं , जिनकी संख्या फिलामेंट के ताप पर निर्भर करती हैं |इस प्रकार कैथोड से एनोड की तरफ बहुत बड़ी संख्या में इलेक्ट्रान त्वरित कर उच्च इलेक्ट्रान धारा (Electron Current)  प्राप्त की जा सकती हैं |यह इलेक्ट्रान बीम सदा एक्सरे ट्यूब में एक ही दिशा ( कैथोड से एनोड की तरफ ) मैं बहती हैं |इस इलेक्ट्रान बीम में इलेक्ट्रान इलेक्ट्रान के मध्य सामान आवेश होने के कारण प्रतिकर्षण बल कार्य करता हैंइस कारण इलेक्ट्रान बीम अपनी चोडाई में फ़ैल जाती हैंजिसके परिणामस्वरूप यह एक्सरे ट्यूब के बहुत बड़े हिस्से पर टकराती हैं | इलेक्ट्रान बीम के इस फैलाव को रोकने व एनोड पर इलेक्ट्रान बीम के टक्कर के क्षेत्र को सिमित करने के लिए फोक्सिंग कप काम में लिया जाता हैं | इस फोक्सिंग कप को फिलामेंट के बराबर ऋण विभव दिया जाता हैं | इसे इस तरह डिजाईन किया जाता हैं कि यह इलेक्ट्रान बीम को टारगेट पर इच्छित आकार व आकृति में अभिसरीत (Convergent करे यह फोक्सिंग कप सामान्यतया निकल का बना होता हैं एक्सरे ट्यूब में सामान्यतया एक व आधुनिक एक्सरे ट्यूब में दो फिलामेंट होते हैं ड्यूल फिलामेंट एक्सरे ट्यूब में दो फिलामेंट Side by Side या One Above Other व्यवस्था में लगे होते हैं इनमे एक फिलामेंट दुसरे से बड़ा होता हैंइनमे एक बार में एक ही फिलामेंट इलेक्ट्रान बीम उत्पन्न करने के काम आता हैं | लार्ज फिलामेंट बड़े (Long) एक्सपोज़र के लिए होता हैं |
 फिलामेंट को एक्सरे ट्यूब के बीम एग्जिट पोर्ट से फ़िल्टर हटा कर देख सकते हैं क्योकि फ़िल्टर गर्म होकर लाल दिखाई देता हैं | आधुनिक एक्सरे मशीन में दो से ज्यादा (3 ) फिलामेंट भी होते हैं तथा स्टीरियोस्कोपिक एन्जियोग्राफ़िक ट्यूब में फिलामेंट एक अलग व्यवस्था में होते हैं, इसमें दो फिलामेंट 4 cm की दूरी पर स्थित होते हैं इनमे एक्सपोज़र से एक स्टीरियोस्कोपिक फिल्म पैर प्राप्त हटा हैं |